- خاطرة بعنوان
- وسادة شقيه
- أبحرتُ بك يا دنيا الشقاء..
- ثمانون عاماً..
- اتوسدُ همومي..
- وأتعكز على جروحي..
- حتى احدودب ظهري..
- شاخت ملامحي..
- وجف عِرقْي..
- وتجعدت قسماتي أسىٍ وتجُلداً..
- أفترشُ همومي قاحلةً..
- بأرضِ البوار..
- وأتوسدُ جُعبة همومي..
- قد هَدَني..
- ألمُ سنين فقري..
- حتى جف الضرع...
- وتسابقت امراضي..
- ترتمي بأحضان جسدي..
- فلم تُبقي لي عوداً..
- الا جَفْ...
- أجمعُ قمامةَ التاريخ..
- بذاكرتي فأغفو...
- على تسولاتي في وطني..
- إنهزمَ الشبابُ...
- غادرني ونأى عني بعيداً...
- وطرحني أرضاً..
- أُلَملِمُ بعضي...
- لأشُدَ على بطني...
- فارغُ..جائعٌ...
- ببردِ شمسي..
- وشيبُ ذقني يشهدُ أسري...
- سجنتني دنيا الشقاءُ..
- ومزقت ثيابَ عُرسي...
- فكسوتني يا زمن القهرِ بلاءَ أمتي..
- تُعزي شبابي..
- وتدفنُ طفولتي..
- وتشيخُ بأرذلِ العمرِ...
- ملامحُ عزّي..
- وأجوبُ القفارَ متسولاً لجوعٍ...
- مزّقَ اوصالي وهدّ حيّلي..
- انتعلُ الشوكَ..وارتدي رثَّ الثياب..
- لعلك تحمي..
- شُحَّ أسيادي..
- وتسند ظهري..
- لفظوني من بطنِ الايامِ..
- طفلا..وكهلاً..
- أتجّرعُ الفقر..
- والجوع..
- وتشردي بأرضي...
- واجمعُ قمامةَ تاريخ مجدٍ...
- سطرةُ اشرافُ قومي..
- وسلاحي عصا...
- ليست بجآنٍ...
- ولا بعصا موسى...
- أهشُ بها وأذودُ عن اهلي...
- رجز وقذارة..
- حُماة وطني...
- لي الله يا نفسي...
- لا يغفلُ عن أمري..
- وسيحققُ حلمي..
- أموت لتحيا أمتي...
- وتنساني كما نسيت أبي.
- ....
- ابتسام البطاينه
- كروان الاردن المغرد.
الخميس، 12 يناير 2017
وسادة شقيه\\\\ ابتسام البطاينه
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